मून “जोधपुरी”
जोधपुर । जहाँ एक तरफ देश का हर युवा भ्रष्टाचार और पेपर लीक जैसी व्यवस्था की मार झेलते हुए अपने सुनहरे भविष्य को बचाने की जद्दोजहद में जुटा है, वहीं देश के सर्वोच्च चिकित्सा संस्थानों में शुमार एम्स (AIIMS) जोधपुर से एक बेहद दर्दनाक और झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। यहाँ एक मेधावी न्यूरोसर्जन छात्र, डॉ. विक्रांत शर्मा, पिछले तीन सालों से अकादमिक पक्षपात, मानसिक उत्पीड़न और बदले की आग में जल रहे हैं। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने सीनियर द्वारा की गई रैगिंग के खिलाफ आवाज उठाई थी। आरोप है कि रैगिंग का विरोध करने की कीमत उन्हें बार-बार फेल होकर चुकानी पड़ी। अब दीक्षांत समारोह के ठीक मुहाने पर खड़े डॉ. शर्मा ने अपनी डिग्री पर लगे ‘चौथे प्रयास’ के बेबुनियाद दाग को हटाने और न्याय पाने के लिए देश और मीडिया के सामने अपना दर्द बयां करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल से गुहार लगाई है।
सच्चाई की आवाज दबाने का आरोप:
साल 2021 में एम. सीएच. न्यूरोसर्जरी के छात्र डॉ. विक्रांत शर्मा ने सीनियर छात्र डॉ. नितिन कुमार की रैगिंग का विरोध किया था। आरोप है कि जब वे सबूत के तौर पर वीडियो लेकर तत्कालीन जिम्मेदार डॉक्टर के पास पहुंचे, तो वीडियो डिलीट कर दिया गया और एचओडी (HOD) ने भी इस गंभीर मुद्दे पर चुप्पी साध ली। इसके बाद से ही पूरे विभाग का रवैया उनके प्रति प्रतिशोध से भर गया।
कागजों में उलझाया गया मेधावी भविष्य:
डॉ. शर्मा का कहना है कि जून 2023 की अंतिम परीक्षा में उन्हें सोची-समझी साजिश के तहत अनुत्तीर्ण किया गया। आरटीआई (RTI) से मिले दस्तावेजों ने साफ किया कि उनके तीन सालों के इंटरनल थ्योरी के औसतन अंकों में हेरफेर की गई थी। अगर सही अंक जुड़ते, तो वे पहले ही प्रयास में टॉपर की तरह पास होते। इतना ही नहीं, नियमों को ताक पर रखकर तीन साल में प्रैक्टिकल मूल्यांकन कराया ही नहीं गया और परीक्षा के दूसरे दिन उनसे कोई सवाल तक नहीं पूछा गया।
अदालत का दरवाजा और कैमरों का पहराः
सिस्टम से हारकर डॉ. शर्मा 17 अक्टूबर 2023 को कोर्ट पहुंचे, जहाँ एम्स जोधपुर प्रशासन समेत संबंधित डॉक्टरों को विपक्षी पार्टी बनाया गया। दिसंबर 2024 में जब हाई-कैमरा सिक्योरिटी, निष्पक्ष बाहरी परीक्षकों और वीडियोग्राफी के साए में स्वतंत्र परीक्षा हुई, तो वे आसानी से सफल हो गए। डॉ. शर्मा का सीधा सवाल है- “जब मैं स्वतंत्र परीक्षा में पास हो सकता हूँ, तो जून 2023 में मुझे जानबूझकर क्यों फेल किया गया?”
राजनीतिक गलियारों तक गुहार, फिर भी जमीनी जांच का इंतजार:
राज्यसभा सांसद राजेन्द्र गहलोत और सांसद हनुमान बेनीवाल के माध्यम से मामला केंद्र तक पहुँचा। केंद्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने पत्र लिखकर शिकायत मिलने की पुष्टि तो की, लेकिन डॉ. शर्मा का दर्द है कि मंत्री के हस्तक्षेप के बावजूद धरातल पर अब तक कोई निष्पक्ष जांच शुरू नहीं हो सकी।
डॉ. विक्रांत शर्मा की प्रमुख माँगें:
निष्पक्ष मूल्यांकन: जून 2023 की परीक्षा का किसी स्वतंत्र एजेंसी से दोबारा पारदर्शी मूल्यांकन कराया जाए।
रिकॉर्ड्स की निष्पक्ष जांच: उत्तर पुस्तिकाओं, प्रैक्टिकल और इंटरनल मार्क्स के रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच हो।
‘प्रथम प्रयास’ की डिग्री: यदि रिकॉर्ड के आधार पर वे योग्य ठहरते हैं, तो उन्हें ‘First Attempt Pass’ की ही डिग्री दी जाए, क्योंकि चौथे प्रयास का ठप्पा उनके पूरे करियर पर जीवनभर का दाग बन जाएगा।
जवाबदेही तय होः उत्पीड़न और फर्जीवाड़े में शामिल दोषी अधिकारियों व शिक्षकों पर सख्त कार्रवाई हो।
आरोपी पक्ष का रुखः
पूरे विवाद पर जब निवर्तमान विभागाध्यक्ष डॉ. दीपक झा से सवाल किया गया, तो उन्होंने निजी टिप्पणी से इनकार करते हुए कहा कि यह मामला व्यक्तिगत न होकर संस्थान (AIIMS) से जुड़ा है और कोर्ट में लंबित है। उन्होंने आधिकारिक जानकारी के लिए संस्थान के ‘जनसंपर्क प्रकोष्ठ’ (PRO Cell) से संपर्क करने की सलाह दी।
करियर पर मंडराता संकट
दीक्षांत समारोह में केंद्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करने जा रही हैं। डॉ. शर्मा चाहते हैं कि समारोह से पहले उन्हें उनका हक मिले। चिकित्सा के क्षेत्र में डिग्री पर लगा ‘अटेम्प्ट’ का टैग किसी भी डॉक्टर की विश्वसनीयता और करियर के मौकों को हमेशा के लिए बर्बाद कर देता है। एक होनहार डॉक्टर का यूं इंसाफ के लिए भटकना हमारी चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा और कड़वा सवाल खड़ा करता है।









