विशेष प्रतिनिधि, अहमदाबाद/भावनगर। भावनगर एसटी बस स्टैंड पर लिव-इन पार्टनर की हत्या के आरोपी के साथ पुलिस द्वारा कथित मारपीट का मामला सामने आने के बाद विवाद गहरा गया है। आरोप है कि अपराध के रीकंस्ट्रक्शन के लिए आरोपी को घटनास्थल पर लाई नीलमबाग पुलिस ने उसे सार्वजनिक रूप से एक खंभे से रस्सी के सहारे बांध दिया और करीब 10 मिनट के भीतर 107 डंडे मारे। घटना को लेकर पुलिस की कार्यप्रणाली और मानवाधिकारों के उल्लंघन पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।
मामले को लेकर Advocate V.A. Shaikh और Advocate Amir Shaikh ने गुजरात हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लिखित आवेदन देकर पूरे प्रकरण का सुओ मोटो (स्व संज्ञान) लेने की मांग की है। आवेदन में संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई किए जाने की मांग भी की गई है।
क्या है पूरा मामला?
जानकारी के मुताबिक, बीती 3 सितंबर को भावनगर एसटी बस स्टैंड परिसर में फैजल नाम के युवक पर अपनी लिव-इन पार्टनर की हत्या करने का आरोप लगा था। घटना के बाद पुलिस ने आरोपी को हिरासत में लेकर मामले की जांच शुरू की।
बताया गया कि 5 सितंबर को पुलिस टीम आरोपी को अपराध के रीकंस्ट्रक्शन के लिए घटनास्थल पर लेकर पहुंची थी। इसी दौरान आरोप है कि नीलमबाग पुलिस स्टेशन के पीआई डी.पी. उनाडकट के निर्देश पर आरोपी को सार्वजनिक स्थान पर एक खंभे से बांधा गया और उसके साथ मारपीट की गई।
आरोप है कि आरोपी को लगभग 10 मिनट तक लगातार डंडों से पीटा गया। घटना की जानकारी सामने आने के बाद पुलिस की कार्रवाई को लेकर विरोध शुरू हो गया है।
पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवाल
मामले में पुलिस पर आरोप है कि उसने जांच प्रक्रिया के दौरान आरोपी के साथ ऐसा व्यवहार किया, जो कानून और मानवाधिकारों के निर्धारित मानकों के विपरीत है। सवाल यह भी उठ रहा है कि किसी आरोपी पर अपराध सिद्ध होने से पहले पुलिस को उसे सार्वजनिक रूप से दंडित करने का अधिकार किस आधार पर दिया गया।
आवेदन में पुलिस की कार्रवाई को लेकर पूर्व डीजीपी के निर्देशों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा आरोपियों एवं हिरासत में लिए गए व्यक्तियों के अधिकारों से जुड़े दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए जांच और कार्रवाई की मांग की गई है।
हाईकोर्ट से सुओ मोटो कार्रवाई की मांग
Advocate V.A. Shaikh और Advocate Amir Shaikh ने गुजरात हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से पूरे मामले का स्वतः संज्ञान लेने की मांग की है। आवेदन में कथित मारपीट की स्वतंत्र जांच कराने और जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की मांग की गई है।
इस मामले ने पुलिस की जांच प्रक्रिया, आरोपी के कानूनी अधिकारों और मानवाधिकारों को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है। अब निगाहें हाईकोर्ट की संभावित कार्रवाई और पुलिस विभाग की ओर से आने वाले आधिकारिक पक्ष पर टिकी हैं।
कानून का मूल सिद्धांत है कि किसी व्यक्ति को अपराधी तभी माना जाता है जब अदालत में अपराध सिद्ध हो। ऐसे में पुलिस द्वारा कथित तौर पर सार्वजनिक रूप से मारपीट किए जाने के आरोप ने कानून-व्यवस्था और पुलिस जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

